
वो कुछ पुराने बीते हुए दिन जब इतनी जिमेदारिया नही थि सिर्फ़ सपने थे समाज या गाँव सेवा के कोई स्वार्थ नही था कोमल हदय में जुनून था कुछ अच्छा करू में हौसला बुलंद कर बढ़ता रहा में अथक परिश्रम करता रहा म खुद के स्वभाव को गढ़ता रहा में धीरे धीरे वक्त बदलने लगा पत्थर भी सिककर पिघलने लगा अब सपने सजाने का वक्त नही अतीत के रंग कुछ ओऱ खिलने लगे हे बस युही सोचा आज कुछ खुद के लिये करके देखु बस कलम ओऱ कागज लेकर कुछ s शबद गाड़ दीये <<<<इन्द्राज राईका 9772776137 >>>>


